वो जब परेशां हो …

वो जब कभी, परेशान या रुसवां हो, तो मेरा ज़िक्र करना उसके सामने,
उसने ही कहा था एक दफा, तुम दिल बहलाने की अच्छी चीज हो …

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नया साल आने वाला है ….

#एक_निवेदन_कि_अगर_पढ़ना_हो_तो_इसे_पूरा_पढ़ें…


◆ नया साल आने वाला है …. ◆


शोर है चारो ओर, जैसे दामाद कोई ससुराल आने वाला है,
इधर भी है चर्चें, उधर भी है जश्न, कि नया साल आने वाला है।


पर क्या कुछ होगा नया, क्या वाकई में कोई कमाल आने वाला है?
क्या देवराज़, या कोई देवता, पाताल आने वाला है ?


क्या कहीं राजा या वजीर, प्रजा का पूछने हाल आने वाला है ?
या फिर हथेलियों सा साफ राजनेताओं पर, ईमानदारी का बाल आने वाला ?


मन में तो हमेशा की ही तरह, भुखाग्नि में पिघलते,
सड़क पर ठिठुरते, ‘भारत’ का ख़याल आने वाला है,


भारत को वही पुरानी वहशीपन से शर्मसार करने को,
महंगाई से लाचार करने को, नया चांडाल आने वाला है,


मैं फिर क्यूँ ये जश्न मनाऊँ की नया साल आने वाला है !!!


जश्न मेरी भी है हसरत, पर कोई यकीन तो दिलाये,
कि सोने का चिड़िया था जो भारत, वापस वो चिरकाल आने वाला है,
अगर नहीं, तो फिर क्या खाक नया साल आने वाला है !!!


फिर कहीं होगा चुनाव, फिर फँसेंगे लोग,
लुटेरा फिर से बिछाने, भँवर-जाल आने वाला है,


फिर कोई वसूलेगा चंदा जज्बातों का,
कि फिर वही धर्मों का दलाल आने वाला है,

इस बार भी मत ही सम्भलना तुम ‘भारत’, बस जश्न ये मनाओ कि नया साल आने वाला है।
क्या अबकी बार, लिपटे तिरँगे की जगह,
फहराते हुए तिरँगा, माँ भारती का लाल आने वाला है ?


क्या अबकी बार, दिल्ली से कोई,
अद्वितीय सफलता का मिसाल आने वाला है?


अरे, अगर नहीं !!! तो छोड़ो जश्न, संभालो ‘भारत’,
नहीं तो हाथों में बस मलाल आने वाला है,


देश में छिपे गद्दारों का रूप,
और भी विकराल आने वाला है,


तुम्हें खुद ही होगी भरनी देशभक्ति रगों में,
नहीं अब कोई दिनकर या इकबाल आने वाला है,


तुम्हें खुद ही होगी रक्षा भी करनी भारत की,
कि नहीं अब कोई कृष्ण या महाकाल आने वाला है,


चेत जाओ सब, कि तुम्हें ही लड़ना है, कि तुम्हें ही मरना है,
बस तभी वो भविष्य खुशहाल आने वाला है,


नहीं तो मिट्टी में मिल जाएगा ये जश्न,
मिट्टी में मिल जाएगा ये भारत, हाथों में बस कंकाल आने वाला है,


मैं शायर, मैं पागल, चला जलने इस आस में,
कि मैं जो जलूँगा, तो ही प्रातःकाल आने वाला है,

जो है जज्बा, तो तुम भी मेरे साथ चलो,
अगर नहीं!! तो जश्न मनाओ तुम, नया साल आने वाला है ।


© Kumar Sonal

#जय_हिंद

Yaadein / यादें

बिसरे, कुछ अफसोस, जिनके करीब जाने पर बिखरने लग जाता हूँ मैं,
धँसे हुए जेहन में, कुछ ज़िद, जिनकी सोहबत में निखरने लग जाता हूँ मैं,

हर एक तरफ, बस, पुरजोर यादों का मेला है,
मुहब्बत ने, मुसीबत ने कुछ ऐसा खेल खेला है,

जो जी रहा हूँ मैं, ये किसी न किसी की इनायत है,
पर घुट-घुट के ही जीना क्या, इश्क़ की रिवायत है,

मैंने देखा, मैंने जिया, ऐसी बहुतें मेला है,
जहाँ मैं, जहाँ हर शख्स, खुद में अकेला है,

© Kumar Sonal

वो अपने ….

गुजर गए जो थे वक्त, मुझे सुकून देकर किसी मखमल की तरह, गड़ रहें हैं वही आज शूल की तरह,
बिखर गए थे जो लोग, मेरे आगोश में पत्तियों सा, होकर जुदा मुझसे निखर रहें हैं, आज फूल की तरह,

© Kumar Sonal

भारतीय सेना को समर्पित …

पूजा वाले कमरे में, बिलखती माँ को छोड़ आया हूँ, बस एक इतना सा ख्याल रखना,
बेड़ियाँ सारे रिश्तों के तोड़ आया हूँ, लौटूँगा कब? बस ये सवाल न करना,

अपने तकिये तले, राखी के धागों को भी खोल दिया है,
हम चले, ये घर है अब आपसे, बूढ़े पिता को भी बोल दिया है,

शरारतों को भी रख के आया हूँ, उन चिड़चिड़ी के झुरमुटों में,
कुछ हसीन फ़िकर साथ लाया हूँ, बांध रुमाल के खूंटो में,

लाया मैं हूँ साथ में, आँसू से भीगे कुछ कतरन भी,
बिन मेरे खुश होंगे सब, साथ एक ये भरम भी,

तस्वीरें कुछ दिल के दरख़्त में, संग आंसुओं के जाम भी,
वो छत पर उगता सूरज, हर रोज की ढलती शाम भी,

समेट लिया हूँ अपने कलतक की यारियाँ, एक सन्दूक में,
चल पड़ा हूँ नए दोस्तों के सोहबत में, जो है, तिरँगे और बन्दूक में,

उफ़नते समंदर के, लहरों की मौज हूँ मैं,
मरकर भी जो अमर है, उस हिन्द की फौज हूँ मैं,

© Kumar Sonal

लहजा कुछ और होगा …

अपनी मुलाकात तो होगी पर लहजा कुछ और होगा,
दिल की बात भी होगी पर लहजा कुछ और होगा,

सूरज भी निकलेगा, ये रात भी होगी, पर लहजा कुछ और होगा,
मैं तेरे साथ भी होऊंगा, तू मेरे साथ भी होगी, पर लहजा कुछ और होगा …

© Kumar Sonal

मैं साहिल था …

*मैं साहिल था …*


मैं साहिल सा था, हर डूबते की ख़्वाहिश थी मुझ तक आने की,
किसी लहर सा छूते-छूते, तूने मुझे कमजोर कर दिया,

भले बिखरा था मैं रेत सा,
पड़ा भी रहता था अचेत सा,

मैं तपता था खुद की दहक से, पर मुझ में भरा शीतलता भी था,
मैं निर्बल, निर्जीव सा था, पर मुझ में एक कोमलता भी था,

अपनी हसरत भरी मुट्ठी में बांध मुझे कठोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,


खामोशियाँ ही मेरी राज़ थी अबतक,
मुस्कुराहटें ही मेरी आवाज थी अबतक,


तेरी बेदर्द उसूलों ने,
मेरे अनजानी भूलों ने,

इस सन्नाटे भरे, सुनसान दिल में, एक शोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,

भले जाल भी बिछाया था सपनों ने, पर वहाँ सत्य बिकता तो नहीं था,
वार दुश्मन ने है किया या अपनों ने, कम से कम दिखता तो नहीं था,

मैं उन अँधेरों में ही ठीक था,
दूर इन सबेरों से ही ठीक था,

खो गया सबकुछ अब चकाचौंध में, जो तूने इस जहाँ को अँजोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,

जैसा भी हो वो कायनात था मेरा,
उलझा ही सही पर हयात था मेरा,

बेपरवाह, बंजारा था मैं, या कहलो रूढ़िवादी ही था,
खानाबदोश, आवारा भी था, पर नसीब आजादी भी था,

बंधन रश्म-ए-रीत से तूने मुझे सराबोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,


© Kumar Sonal

संभाल मुझे …

जरा संभाल भी मुझे, ऐ मेरे खुदा, कि,
ख़्वाहिशों और मजबूरियों से मिल रही, अब कुछ ऐसी कुठाराघात है,

दिल को मिल रहा सह सपनों से और मन को मिल रहा, सुबहों से मात है,
कि अब मेरा ये दिल हुए जा रहा गोधरा, और मन गुजरात है …

ये दिल बन रहा, टूटे हसरतों का सदन है,
सब से, तुमसे, बस एक यही निवेदन है …

कल हुआ था क्या, ये याद दिलाया न करो,
ये जो हो रहा आज, ये भी समझाया न करो,
कल होगा क्या, ये भी सपनें दिखाया न करो …

बस मुझे एहसास दिला कि, तू अब भी मेरे साथ है, 
हिम्मत भी बंधा मुझे, कि बड़ी स्याह आज ये रात है,
मुझे गले से लगाकर संभाल कि, अभी शबाब पर जज्बात है …

© Kumar Sonal