ज़िन्दगी

अहम तो बेशक मैं भी करता पर जिंदगी की कुछ तस्वीरें इजाजत नही देती —

चेहरों के रंग संग नींदे उड़ाया करते जो कभी
खुद बेरंग हुए अंधेरे तलाश रहे है अभी

सवाल पे सवाल किया करते थे जो कभी
आज खुद उलझे है सवाल बने अभी

खबर रखा जो करता था कभी पूरे ज़माने के
जमाना है बेख़बर अभी अपने उस दीवाने से

रखी थी जिसने उंगलियां कभी किसीके होठ पे
व्यथा जरा सी क्या बढ़ी वो खुद लगा है चीखने

बुझाई थी जिसने दीप कल , आज सूर्य को है तक रहा
दावा गए बन शब्द वो, सदियों से जो था शक रहा

जिसके द्वार पर हुजूम था लगता बस इक दीदार को
मूरत बने वो लेटा था अपनो के इन्तेज़ार को

मशहूर जो अक्सर रहा था लेकर अपनी क्रांति को
मशवरे वो दे रहा है अन्तःमन कि शांति को

सबब जो पूछा करते थे कल तक मेरे इस हाल का
आज बुनकर बन बैठे है बर्बादी के मेरे जाल का

© Kumar Sonal