आतंक के रहनुमाओं को संदेश …

तेरे कायरता का क्या, तेरा भी नामोनिशान नहीं होगा, 

दफ़्न करने को तुझे राज़ी, न श्मशान होगा न कब्रिस्तान होगा …

लगा लेना हिसाब कभी ईमानदारी से, तेरे जनसँख्या से ज्यादा मेरा बलिदान होगा,
ठान लिया जिस दिन क़त्लेआम का, तेरे आँगन में हवन, तेरे छाती पर अज़ान होगा …

बिछा के रख जाल जमीं पे, खुद फँसोगे मैं नहीं, मेरा तो तेरे आसमाँ में उड़ान होगा,
कल्पना का संसार बनाने चले हो शायद, नादान हो तुम, तेरा मनसूबा भी नादान होगा …

ये जो मनमानियोँ की बारूद लिए फिर रहे हो अपने हाथों में, भांप लो, आ गया ज़िद पे जिसदिन, तेरा समाधान होगा,
उन्ही बारूदों के विस्फ़ोट में, जल रहा तेरा अरमान होगा, जल रहा तेरा पाकिस्तान होगा …

प्यासे हो लहू के, तो इस लहूलुहान की सुन लो, तेरे ही ज़द में, मेरा फ़रमान होगा,
बहुत श्वेत-कबूतर परोसे अबतक, अब तो जंग का ऐलान होगा …

निर्दोष मनुज को मार दे, तेरे ही लिए ये आसान होगा,
पर ठन गया जब ये युद्ध अगर, फिर न कोई एहसान होगा …

कतरा-कतरा रक्त निचोड़ लूँगा तेरे धमनियों से, लहू-विहीन तेरा ये पाक, रेगिस्तान होगा,
हर ओर एक बवंडर, डर का, हर ओर एक तूफ़ान होगा …

संदेह नही वैसे तो मुझे अपने वीरों पर, जिसके कंधे पर हिंद का कमान होगा,
फिर भी जो बच गए, तो समझ लेना, इंसानियत को हिन्द का अभयदान होगा …

आगाज़ से खुश हो जल्दी कर रहे तुम, डर तू कि, तेरा क्या अंजाम होगा,
खड़ा होजा तू कितनों निर्दोषों के शव पर, तेरे सिर से उच्चा मेरा ‘हिन्दुस्तान’ होगा …

पहचान कोई खास नहीं रखता ‘अंश’ –

एक हाथ में गीता तो एक में क़ुरान होगा,
मन रँगा हुआ तिरँगा से, दिल में हिंदुस्तान होगा,
ये ‘अंश’ है हिन्द का बोल रहा, हर ‘अंश’ यहाँ, हिन्द पे क़ुर्बान होगा …

© Kumar Sonal ‘अंश’

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आबरू

वो तो आबरू है जुड़ी, आँचल से, जो संभाल लेती हूँ,

उतार फेंकूँगी इन्हें ‘अंश’ जिस दिन ज़माने की ज़िद जुड़ गई …

© Kumar Sonal ‘अंश’

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह …

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह को नमन उनके जन्मदिवस पर —

समर्पित है मेरा एक छोटा सा प्रयास …
★ वो भगत सिंह थे … ★
आज़ादी के रवानी में, लहू उसने भी बहाई थी,

सबकी आज़ादी के खातिर, आज़ादी अपनी ठुकराई थी …
क्राँति की अलख जगाने को, त्यागी अपनी रिहाई थी,

ऊँचा कर मान तिरँगे का, सिर दुश्मनों की झुकाई थी …

वो भगत सिंह थे …
उम्र थी जब, गिल्ली-डंडे की, तब छेड़ी उसने लड़ाई थी,

एक मुट्ठी में बम-गोले, तो एक में ‘शरारत’ छुपाई थी …
बन्दूक थी मोटी कहीं उससे, जितनी मोटी कलाई थी,

पर देख कौशल उस युवा की, तानाशाही घबराई थी …

वो भगत सिंह थे …
भाग्य देखो उन बेड़ियों के, जो उनको छूने पाई थी,

फाँसी के नादां फंदे भी, तो देख उन्हें हर्षाई थी …
है वीर चला मुझे छोड़ सोच, काल-कोठरी भी अकुलाई थी,

हो विभोर ‘भगत’ की देशभक्ति से, दिन फाँसी की अलसाई थी …

वो भगत सिंह थे …
पीड़ा उनको लिखने वाली, वो क़लम भी कतराई थी,

शरमा रही थी जिस तक जाने से, खुद ही जिसकी कठिनाई थी …
मार देने, या मर जाने की, बस धुन जिसमे समाई थी,

हुँकार सम्पूर्ण भारतवर्ष का, बहरों को जिसने सुनाई थी …

वो भगत सिंह थे …
व्याकुल है मन, यही सोच-सोच –
पुण्य क्या उस कुँए का, पानी जिसने पिलाई होगी,

भाग्य क्या उस कतरन का, लहू-आँसू से जिसे भिगाई होगी,

मुक़द्दर क्या उस फंदे की, जिसको गले उसने लगाई होगी,
थी आज़ादी जिसकी दुल्हन, उसको भी सौंप, वे चले गए,

ज़वानी अपनी, अपना मन, अपनी प्राण झोंक वे चले गए …
#नमन #शहीद_ए_आज़म #भगत_सिंह

                🙏🙏🙏
© Kumar Sonal

लिखने की ज़िद …

हिचकियाँ जब यादों के भारी पड़ते हैं, मेरे आज पर, तो लिख लेता हूँ बस, कभी कभी, अपनी परेशानियाँ …

अफवाहों के सफाई में कौन उलझे, जब दिल में अंबार पड़े हो हसरतों की, तो सह लेता हूँ, कभी कभी, अपनी झूठी बदनामियाँ …

जब शिथिल सी होने लग जाती है ये ज़िन्दगी, तो रफ़्तार को, कर लेता हूँ मैं भी, कभी कभी, हल्की सी, मीठी सी बचकानियाँ …

आईने में देख खुद को, तस्वीर किसी और की उभरती है, तो मुस्कुरा भी देता हूँ, कभी कभी, याद कर बीती नादानियाँ …

समझ जो जाता है कोई, इन मुस्कराहटों के पीछे का सच, तो छिपा लेता हूँ सारी सच्चाई, छेड़ कर नई कहानियाँ …

व्यथा दौड़ने लग जाती है, अगले ही पल, धमनियों में, रोकूँ कैसे आखिर, जो उभर आती है चेहरे पर ये अनचाही हैरानियाँ …

मैं ख़ुद छूट जाता हूँ पीछे मेरे परछाई के, सारे मालूमात, सारे इल्मों से परे, दिख ही जाती है, इस बेईमान दिल की बेइमानियाँ …

© Kumar Sonal

रामधारी सिंह दिनकर — जन्मदिवस – 23 September.

★ सुनूँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं, 

सुनूँ क्या बंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं सिमरिया का भूमिहार हूँ मैं …

© – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

आज ही के दिन, उदीप्तिमान हुआ था, साहित्य के ललाट में एक सूर्य,
आज ही के दिन, अँकुरित हुआ था, एकमात्र पारिजात, साहित्यिक फुलवारी में,
आज ही के दिन, हिम पिघला था, साहित्य का एक नया निर्झर बनाने को,
आज ही के दिन हुई थी शुरुआत, विचारों से विस्फ़ोट का, देश के हुँकार का …

आज ही के हुआ था जन्म, अमिट लकीर का, कभी न बुझने वाला ज्योतिपुंज का …
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का …🙏🙏🙏

★#दिनकर_है_वो …

साहित्य जो वीर, तो शौर्य है वो,
साहित्य जो वंश, तो मौर्य है वो …

साहित्य जो दीप, तो रोशनी है वो,
सहित के पराकाष्ठा का प्रदर्शनी है वो …

साहित्य जो मानव, तो जल है वो,
साहित्य जो समंदर, तो तल है वो …

कल्पनाओं में सत्य का लश्कर है जो,
अमिट लेखनी का बुनकर है वो,
रामधारी सिंह’दिनकर’ है वो …

साहित्य जो व्योम, तो रवि है वो,
जन की हुंकार, #राष्ट्रकवि है वो …

◆ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को समर्पित मेरी ये लिखने की ज़िद …
🙏🙏🙏

© Kumar Sonal

मेरे खत से …

गुजरे ग्रीष्म से लाया हूँ गर्मी मेरे बातों की, 

दिल-ये-ठंडक भी मेरी कर्ज है सर्दी के उन रातों की …

उन पतझड़ों से भी ढूंढ लाया हूँ कुछ पत्तों को,
कभी कोशिश करना पढ़ने को मेरे खतों को …

चंद ही सही पर बिखरे जज़्बात मिलेंगे,
रोशनी से परेशान वो मेरे रात मिलेंगे …

आशंकाओं से घिरे आशाएं कि- कभी हम साथ मिलेंगे,
जो कभी हो न पायी बयाँ वो मेरे बात मिलेंगे …

मन को भिगाने वाले, मेरे मौन आँखों के वो प्रपात मिलेंगे,
सह गया जिसे मैं चुपचाप, अनगिनत ऐसे आघात मिलेंगे …

लिखी है जिससे विरह और आलिंगन, आँखों में मेरे वे दवात मिलेंगे,
सीमित है जो बस मेरे दिल के दरारों तक, आँसुओं के वो बरसात मिलेंगे …

मेरी ये उलझी, परेशान ज़िन्दगी है सबसे अलग, यूँ तो तुम्हे बहुत उजड़े हयात मिलेंगे,
ज़िद है मेरी, मेरी ही उजड़ी दुनिया का, अगर ढूंढूं तो कितने ही आबाद कायनात मिलेंगे …

वो तो मन है मेरा, यादों के पहलू में ही सोने का, जो एक इशारा जो कर दूं, कितने पारिजात मिलेंगे,
करता वही हूँ जो मन को मंजूर है, दिल की जो सुन लूं तो हर रोज़ एक करामात मिलेंगे …

अपनों के वहम में ही गुज़ार दूंगा ये ज़िन्दगी, सत्य बताने वाले ग़ैर बहुतात मिलेंगे

© कुमार सोनल

बेख़बर

शायद बेख़बर है वो, मेरे अंदाज़-ए-नजरअंदाज़ से,

जो ख़बर में रहती है, बस मुझे ख़बर करने को …

कैद में है ये दिल …

कैद में है ये दिल मेरा तेरे यादों के कमरे में
सोच में पड़ा हूँ तेरे ईश्क़ का चश्मा रहने दूँ या उतार दूँ …

© Kumar Sonal

अतीत

झाँकोगे जो कभी अतीत में अपने, बदलते रिश्तों के ख़रोंच दिखेंगे
मन का अफ़सोस, दिल के दर्द संग आँसुओ के, निःसंकोच दिखेंगे

© कुमार सोनल