यादें

बड़ी कोलाहल करती थी जो दिल मे, वो अचेत होने को है,
इंद्रधनुष सी यादें थी जो किसी की, आज श्वेत होने को है,

लगभग यादों का कारवाँ गुजर गया है,
पर है एक-दो ज़िद्दी, जो ठहर गया है,

कमबख्त तकलीफ बहुत देतें हैं जो छुपी यादें हैं,
भले एक-दो ही हैं, पर बहुत ज्यादे हैं,

वो जो छिप कर बैठें है अंतर्मन के गहरे कुओं में,
पर, उड़ जाएंगे वो भी एक दिन, सिगरेट के धुओं में,

© Kumar Sonal

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बदलने की रुत …

मेरे दुश्मन, मेरे अजीज, मेरे दोस्तों, मेरी एक शिकायत सुनलो,
बदल जाऊँगा मैं भी, तुम अगर बदले, मेरी हिदायत सुनलो,

© Kumar Sonal

आबरू

वो तो आबरू है जुड़ी, आँचल से, जो संभाल लेती हूँ,

उतार फेंकूँगी इन्हें ‘अंश’ जिस दिन ज़माने की ज़िद जुड़ गई …

© Kumar Sonal ‘अंश’

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह …

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह को नमन उनके जन्मदिवस पर —

समर्पित है मेरा एक छोटा सा प्रयास …
★ वो भगत सिंह थे … ★
आज़ादी के रवानी में, लहू उसने भी बहाई थी,

सबकी आज़ादी के खातिर, आज़ादी अपनी ठुकराई थी …
क्राँति की अलख जगाने को, त्यागी अपनी रिहाई थी,

ऊँचा कर मान तिरँगे का, सिर दुश्मनों की झुकाई थी …

वो भगत सिंह थे …
उम्र थी जब, गिल्ली-डंडे की, तब छेड़ी उसने लड़ाई थी,

एक मुट्ठी में बम-गोले, तो एक में ‘शरारत’ छुपाई थी …
बन्दूक थी मोटी कहीं उससे, जितनी मोटी कलाई थी,

पर देख कौशल उस युवा की, तानाशाही घबराई थी …

वो भगत सिंह थे …
भाग्य देखो उन बेड़ियों के, जो उनको छूने पाई थी,

फाँसी के नादां फंदे भी, तो देख उन्हें हर्षाई थी …
है वीर चला मुझे छोड़ सोच, काल-कोठरी भी अकुलाई थी,

हो विभोर ‘भगत’ की देशभक्ति से, दिन फाँसी की अलसाई थी …

वो भगत सिंह थे …
पीड़ा उनको लिखने वाली, वो क़लम भी कतराई थी,

शरमा रही थी जिस तक जाने से, खुद ही जिसकी कठिनाई थी …
मार देने, या मर जाने की, बस धुन जिसमे समाई थी,

हुँकार सम्पूर्ण भारतवर्ष का, बहरों को जिसने सुनाई थी …

वो भगत सिंह थे …
व्याकुल है मन, यही सोच-सोच –
पुण्य क्या उस कुँए का, पानी जिसने पिलाई होगी,

भाग्य क्या उस कतरन का, लहू-आँसू से जिसे भिगाई होगी,

मुक़द्दर क्या उस फंदे की, जिसको गले उसने लगाई होगी,
थी आज़ादी जिसकी दुल्हन, उसको भी सौंप, वे चले गए,

ज़वानी अपनी, अपना मन, अपनी प्राण झोंक वे चले गए …
#नमन #शहीद_ए_आज़म #भगत_सिंह

                🙏🙏🙏
© Kumar Sonal