यादें

बड़ी कोलाहल करती थी जो दिल मे, वो अचेत होने को है,
इंद्रधनुष सी यादें थी जो किसी की, आज श्वेत होने को है,

लगभग यादों का कारवाँ गुजर गया है,
पर है एक-दो ज़िद्दी, जो ठहर गया है,

कमबख्त तकलीफ बहुत देतें हैं जो छुपी यादें हैं,
भले एक-दो ही हैं, पर बहुत ज्यादे हैं,

वो जो छिप कर बैठें है अंतर्मन के गहरे कुओं में,
पर, उड़ जाएंगे वो भी एक दिन, सिगरेट के धुओं में,

© Kumar Sonal

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संभाल मुझे …

जरा संभाल भी मुझे, ऐ मेरे खुदा, कि,
ख़्वाहिशों और मजबूरियों से मिल रही, अब कुछ ऐसी कुठाराघात है,

दिल को मिल रहा सह सपनों से और मन को मिल रहा, सुबहों से मात है,
कि अब मेरा ये दिल हुए जा रहा गोधरा, और मन गुजरात है …

ये दिल बन रहा, टूटे हसरतों का सदन है,
सब से, तुमसे, बस एक यही निवेदन है …

कल हुआ था क्या, ये याद दिलाया न करो,
ये जो हो रहा आज, ये भी समझाया न करो,
कल होगा क्या, ये भी सपनें दिखाया न करो …

बस मुझे एहसास दिला कि, तू अब भी मेरे साथ है, 
हिम्मत भी बंधा मुझे, कि बड़ी स्याह आज ये रात है,
मुझे गले से लगाकर संभाल कि, अभी शबाब पर जज्बात है …

© Kumar Sonal

ये जमाना …

याद, याद और बस याद, एक यही था जो मेरे साथ चलता रहा,
बाकी जमाना और एक ये सूरज तो मेरे सपनों के साथ जलता रहा …

© Kumar Sonal

बदलने की रुत …

मेरे दुश्मन, मेरे अजीज, मेरे दोस्तों, मेरी एक शिकायत सुनलो,
बदल जाऊँगा मैं भी, तुम अगर बदले, मेरी हिदायत सुनलो,

© Kumar Sonal

आबरू

वो तो आबरू है जुड़ी, आँचल से, जो संभाल लेती हूँ,

उतार फेंकूँगी इन्हें ‘अंश’ जिस दिन ज़माने की ज़िद जुड़ गई …

© Kumar Sonal ‘अंश’