दस्तखत लबों के …

बुन लिया है मैंने हमारी प्रेम कहानी, मेरे लबों से,
बस तुम हो बाखबर, बाकी ये बेखबर है सबों से,

हर ओर बिखरी खुशी, हर ओर मोहब्बत होगी,
जब दिल की मेरे, तेरे दिल से सोहबत होगी,

ले ले मुझे आज तू अपने आगोश में, दिल के पनाहों में,
कोशिश कर पढ़ने को, जो है मेरे खामोश निगाहों में,

है ख़्वाहिश मेरी, तेरी खुशियों का, तुझे दूर गम से, ले जाना,
है मंजूर तुम्हें भी, मुहब्बत गर तो, दस्तख़त लबों के दे जाना …

© Kumar Sonal

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ये जमाना …

याद, याद और बस याद, एक यही था जो मेरे साथ चलता रहा,
बाकी जमाना और एक ये सूरज तो मेरे सपनों के साथ जलता रहा …

© Kumar Sonal

बदलने की रुत …

मेरे दुश्मन, मेरे अजीज, मेरे दोस्तों, मेरी एक शिकायत सुनलो,
बदल जाऊँगा मैं भी, तुम अगर बदले, मेरी हिदायत सुनलो,

© Kumar Sonal

आबरू

वो तो आबरू है जुड़ी, आँचल से, जो संभाल लेती हूँ,

उतार फेंकूँगी इन्हें ‘अंश’ जिस दिन ज़माने की ज़िद जुड़ गई …

© Kumar Sonal ‘अंश’

मेरे खत से …

गुजरे ग्रीष्म से लाया हूँ गर्मी मेरे बातों की, 

दिल-ये-ठंडक भी मेरी कर्ज है सर्दी के उन रातों की …

उन पतझड़ों से भी ढूंढ लाया हूँ कुछ पत्तों को,
कभी कोशिश करना पढ़ने को मेरे खतों को …

चंद ही सही पर बिखरे जज़्बात मिलेंगे,
रोशनी से परेशान वो मेरे रात मिलेंगे …

आशंकाओं से घिरे आशाएं कि- कभी हम साथ मिलेंगे,
जो कभी हो न पायी बयाँ वो मेरे बात मिलेंगे …

मन को भिगाने वाले, मेरे मौन आँखों के वो प्रपात मिलेंगे,
सह गया जिसे मैं चुपचाप, अनगिनत ऐसे आघात मिलेंगे …

लिखी है जिससे विरह और आलिंगन, आँखों में मेरे वे दवात मिलेंगे,
सीमित है जो बस मेरे दिल के दरारों तक, आँसुओं के वो बरसात मिलेंगे …

मेरी ये उलझी, परेशान ज़िन्दगी है सबसे अलग, यूँ तो तुम्हे बहुत उजड़े हयात मिलेंगे,
ज़िद है मेरी, मेरी ही उजड़ी दुनिया का, अगर ढूंढूं तो कितने ही आबाद कायनात मिलेंगे …

वो तो मन है मेरा, यादों के पहलू में ही सोने का, जो एक इशारा जो कर दूं, कितने पारिजात मिलेंगे,
करता वही हूँ जो मन को मंजूर है, दिल की जो सुन लूं तो हर रोज़ एक करामात मिलेंगे …

अपनों के वहम में ही गुज़ार दूंगा ये ज़िन्दगी, सत्य बताने वाले ग़ैर बहुतात मिलेंगे

© कुमार सोनल