मेरे भारत की क्या बात कहूँ!!

समस्या में है, भारत या फिर, भारत में समस्या है,
दूर करेगा कौन इसे, कहाँ भागीरथी-तपस्या है,

हैं आज से अनजान हम, गर्व मद में चूर इतिहास पर,
कभी राम के शर पर तो, कभी रावण के चन्द्रहास पर,

है दंश झेल रहा देश पर, न राजपूत का पौरूष बोला,
न ही फरसा परशुपुत्र का, न यदुवंश का खून ख़ौला,

मेरे भारत की, मैं क्या बात कहूँ, उसकी अजीब क्या करामात कहूँ,

क्या कहूँ कि भारत है ग्रसित, गृहयुद्ध जैसे फसाद से,
या कहूँ कि भारत है ग्रसित, प्रांत और नक्सलवाद से,

क्या कहूँ कि भारत है ग्रसित, कुछ सिरफिरे जिहादियों से,
या कहूँ कि भारत है ग्रसित, कुछ भटके आतंकवादियों से,

हैवानों की लहू की तृषा, न अब तक है समाप्त हुआ,
शीतल कोमल भारत में, साम्प्रदायिकता व्याप्त हुआ,

भारत जल रहा गृहयुद्ध में, विधवाएं हैं बिलख और तड़प रही,
रहें मुस्कुरा धर्म के ठेकेदार, दो कौमों के बीच हो झड़प रही,

चलते फिरते सड़कों पर, उजालों में दंगा होता है,
पवित्र सरजमीं भारत पर इंसानियत नंगा होता है,

सब हताश, निराश, लाचार है, सर ताने बस भ्रष्टाचार है, नागिन-नाच कराती पूंजीपतियों का, सपेरों सी सरकार है,

मेरे भारत की, मैं क्या बात कहूँ, उसकी अजीब क्या करामात कहूँ,

होगी निर्मल एक दिन गंगा, ये सोच बैठ सब जाते है,
हो गए आज क्या नहीं पता, थे क्या इसपे इठलाते हैं,

माता-बहने हर रोज सड़क पर, होते रहते शर्मिंदा हैं,
दुश्मन घर तक घुस आतें हैं, सब करते बस निंदा हैं,

असहाय, दीन, लाचार बच्चे, सड़कों पर मांगते है भिक्षा,
असमय समय की मार से, है मर गयी उनकी हर इच्छा,

हर-दिन, हर-पल प्रकृति खुद, लेती जिनकी परीक्षा है,
दो रोटी के मोहताज को, नसीब कहाँ कोई शिक्षा है,

साजिश जो थी चिरकाल से, वो जाल अबतक टूटा नहीं,
कुप्रथा-कुरीति के बेड़ी से पीछा समाज का छूटा नहीं,

आजादी की स्वर्णजयंती, हम हर नववर्ष मनाते हैं,
पर घर से निकलना कम, ये बेटियों को सिखाते हैं,

कैद अगर करना है तो, झूठी शान को अपने कैद करो,
बस नारी ही पर पहरे हैं क्यूँ, नर पर भी नर मुस्तैद करो,

घर की हर एक मुश्किल को, हँस कर खुद जो सहती है,
ग्रसित जमाना पूर्वाग्रह से, उसे ही ‘अबला’ कहती है,

मेरे भारत की, मैं क्या बात कहूँ, उसकी अजीब क्या करामात कहूँ,

न ही अब तक है मिट पाया, भेद ऊंच-नीच का,
न ही है पट पाई खाई, दरिद्र-धनी के बीच का,

बंटवारे में भी बंटवारा कि, तुम सुन्नी हो हम शिया हैं,
तुम हिंदी और बांग्ला, हम तेलगु, उड़िया हैं,

है और बंटे जाति में हम,
फैले झूठी ख्याति में हम,

हैं राम तेरे, हैं श्याम मेरे,
है कर्ण तेरे, परशुराम मेरे,

किसी ने भगवा को तो, किसी ने, हरे को अपना मान लिया,
पछताते होंगे तिरँगा पर मरनेवाले, कि व्यर्थ ही उसने जान दिया,

भले रँग है इनका कोई पर किये, लोलुपता हैं सब धारण,
हैं बुनती, देश बांटने को, सियासत तो यहाँ कोटि कारण,

भगवान भी उसने बाँट दिए, इंसान भी उसने बाँट दिए,
समरसता के खिलते फूल, उससे पहले पौधें काट दिए,

हैं जल रहें नगर घर और बस्ती,
ज़िन्दगनियाँ हो गई सबसे सस्ती,

मैं क्या कहूँ कि किसका दोष है,
हर एक मन में यहाँ अफसोस है,

मेरे भारत की, मैं क्या बात कहूँ, उसकी अजीब क्या करामात कहूँ,

वो सत्ताधीश बन जाते हैं, जो करते रोज कुकर्म है,
ढोंग करते देशभक्त का, आती न तनिक भी शर्म है,

निज स्वार्थ में सीमाओं पर, उलझाई देश की शांति है,
सत्ता के भूखों ने देश मे, भड़काई खूनी-क्रांति है,

जनता के निष्ठा, त्याग से, जिस देश की शक्ति लहती है,
हैं नेता घूमते स्वर्णरथ, और वेदना जनता सहती है,

संसद में पकौड़े हैं तले जा रहे,
लोकतंत्र के खुदा हैं छले जा रहे,

बड़ा महान मेरा देश है, ये जो आर्यवर्त, जो भारत है,
बेबस इसकी सन्ततियाँ हैं और बेबस इसके सदारत है,

पर इन सबका समाधान करेगा कौन,
हैं जब बैठे सब बुद्धिजीवी मौन,

ये सोच हैं बैठे सब हाथ धरे,
हम ही क्यूँ, जब कोई न करे,

मेरे भारत की, मैं क्या बात कहूँ, उसकी अजीब क्या करामात कहूँ,

एक लम्हा हूँ कवियुग का मैं, नहीं कुछ, बस चिंता गढ़ता हूँ,
ओ तरूणों! तेरे ही लिए, कविता लिखता और पढ़ता हूँ,

शब्दों में अपने सूरज-तप भर, तुम्हें जगाने मैं आया हूँ,
है आजादी में लिपटी बन्दिश जो, उसे दिखाने मैं आया हूँ,

देना संदेश जो कवि-धर्म है, मैं उसका निर्वहन करता हूँ,
मैं साहित्यिक-गिरि का धूल मात्र, तुम से आह्वान करता हूँ,

ये लेखनी मेरी जीवन है, पहुंचा रहा हूँ मैं संदेशा एक,
है गर्त में जा रहा भारत ये, मन में है मेरे अंदेशा एक,

मेरी कल्पना समझ न भूल जाना, मथना इसको गम्भीरता से,
समस्या है तो, हल भी होगा, बस परखना इसको धीरता से,

सर्वोपरि देश या स्वार्थ है, एक बात ये तुम स्पष्ट करो,
बदली जो है तम की उसको, आभा से अपने नष्ट करो,

तू जिद कर यशस्वी सूर्य सा, अंबर निर्मेघ हो जाएगा,
जितने भी श्यामल-लाँछन है, शीघ्र सफेद हो जाएगा,

तू ठान यज्ञ, तेरे भारत को, आहुति दे अपने कुकर्मों का,
हविश तेरा भविष्य है, ये ही सार है गूढ़ मर्मों का,

तू बढ़ आगे कि तेरे कंधे पर, ही निर्भर हिंद का भाग्य है,
ये कोई बोझ नहीं है ओ तरुणों, तेरे जीवन का सौभाग्य है,

तम गम से है भारत जूझ रहा, दूजे ओर हो बस तुम मूकदर्शक,
पर ‘दिनकर’ कह गए हैं कि, तुम तटस्थ भी दोषी हो बेशक,

न कुछ ज्यादा, न कुछ कम, तेरी ईमान मैं तुझसे मांगता हूँ,
खो गया है स्वर्णिम युग जो, वो हिंदुस्तान तुझसे मांगता हूँ,

© Kumar Sonal

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दस्तखत लबों के …

बुन लिया है मैंने हमारी प्रेम कहानी, मेरे लबों से,
बस तुम हो बाखबर, बाकी ये बेखबर है सबों से,

हर ओर बिखरी खुशी, हर ओर मोहब्बत होगी,
जब दिल की मेरे, तेरे दिल से सोहबत होगी,

ले ले मुझे आज तू अपने आगोश में, दिल के पनाहों में,
कोशिश कर पढ़ने को, जो है मेरे खामोश निगाहों में,

है ख़्वाहिश मेरी, तेरी खुशियों का, तुझे दूर गम से, ले जाना,
है मंजूर तुम्हें भी, मुहब्बत गर तो, दस्तख़त लबों के दे जाना …

© Kumar Sonal

संभाल मुझे …

जरा संभाल भी मुझे, ऐ मेरे खुदा, कि,
ख़्वाहिशों और मजबूरियों से मिल रही, अब कुछ ऐसी कुठाराघात है,

दिल को मिल रहा सह सपनों से और मन को मिल रहा, सुबहों से मात है,
कि अब मेरा ये दिल हुए जा रहा गोधरा, और मन गुजरात है …

ये दिल बन रहा, टूटे हसरतों का सदन है,
सब से, तुमसे, बस एक यही निवेदन है …

कल हुआ था क्या, ये याद दिलाया न करो,
ये जो हो रहा आज, ये भी समझाया न करो,
कल होगा क्या, ये भी सपनें दिखाया न करो …

बस मुझे एहसास दिला कि, तू अब भी मेरे साथ है, 
हिम्मत भी बंधा मुझे, कि बड़ी स्याह आज ये रात है,
मुझे गले से लगाकर संभाल कि, अभी शबाब पर जज्बात है …

© Kumar Sonal

बदलने की रुत …

मेरे दुश्मन, मेरे अजीज, मेरे दोस्तों, मेरी एक शिकायत सुनलो,
बदल जाऊँगा मैं भी, तुम अगर बदले, मेरी हिदायत सुनलो,

© Kumar Sonal

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह …

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह को नमन उनके जन्मदिवस पर —

समर्पित है मेरा एक छोटा सा प्रयास …
★ वो भगत सिंह थे … ★
आज़ादी के रवानी में, लहू उसने भी बहाई थी,

सबकी आज़ादी के खातिर, आज़ादी अपनी ठुकराई थी …
क्राँति की अलख जगाने को, त्यागी अपनी रिहाई थी,

ऊँचा कर मान तिरँगे का, सिर दुश्मनों की झुकाई थी …

वो भगत सिंह थे …
उम्र थी जब, गिल्ली-डंडे की, तब छेड़ी उसने लड़ाई थी,

एक मुट्ठी में बम-गोले, तो एक में ‘शरारत’ छुपाई थी …
बन्दूक थी मोटी कहीं उससे, जितनी मोटी कलाई थी,

पर देख कौशल उस युवा की, तानाशाही घबराई थी …

वो भगत सिंह थे …
भाग्य देखो उन बेड़ियों के, जो उनको छूने पाई थी,

फाँसी के नादां फंदे भी, तो देख उन्हें हर्षाई थी …
है वीर चला मुझे छोड़ सोच, काल-कोठरी भी अकुलाई थी,

हो विभोर ‘भगत’ की देशभक्ति से, दिन फाँसी की अलसाई थी …

वो भगत सिंह थे …
पीड़ा उनको लिखने वाली, वो क़लम भी कतराई थी,

शरमा रही थी जिस तक जाने से, खुद ही जिसकी कठिनाई थी …
मार देने, या मर जाने की, बस धुन जिसमे समाई थी,

हुँकार सम्पूर्ण भारतवर्ष का, बहरों को जिसने सुनाई थी …

वो भगत सिंह थे …
व्याकुल है मन, यही सोच-सोच –
पुण्य क्या उस कुँए का, पानी जिसने पिलाई होगी,

भाग्य क्या उस कतरन का, लहू-आँसू से जिसे भिगाई होगी,

मुक़द्दर क्या उस फंदे की, जिसको गले उसने लगाई होगी,
थी आज़ादी जिसकी दुल्हन, उसको भी सौंप, वे चले गए,

ज़वानी अपनी, अपना मन, अपनी प्राण झोंक वे चले गए …
#नमन #शहीद_ए_आज़म #भगत_सिंह

                🙏🙏🙏
© Kumar Sonal