कल्पना

मैं इस दीवाली में भी दिल का एक कोना अँधेरा छोड़ दूँगा, तेरी यादों के अल्हड़
शौक़ीनीओं को,
आने वाली होली के रँगीन महफ़िल में भी दिल का एक अंश श्वेत रखूँगा, बीती-बातों की रंगीनियों को …

यूँ तो भरे पड़े हैं कलाई दोस्ती के धागों से, पर दिल को एक खाली छोड़ देने की है ख़्वाहिश, तेरे इशारों को,
अपने सारे शरारतों को छुपा के रखा हूँ, एक निराश आश में, कि ऊब कर फ़रमोशिओं से,
याद करोगे बिसरे यारों को,

रोज़ देर तक है, डुबकियाँ लगाता ये दिल, परेशान रौशनी की चकाचौंध में,
एक सुकून भरे ,
गहन अँधेरे की तलाश में,
कई अफवाहों को सच बनाने हैं, कुछ मज़बूरियों को मजबूर भी करनी है मुझे, फुर्सत नहीं है, बाँट के दे दो अब मेरे हिस्से,
जो हैं आकाश में,

कई लोकोक्तियाँ है मेरे मन में, जिसे चरितार्थ करनी है,
कुछ सोहबतें भी हैं, जिन्हें कृतार्थ करनी है,

बहेलियों से सीखूँगा अभी मैं, कुछ त्याग, कुछ कला,
लगा कैसे लेते हैं दांव पर दाने, अपने दानों के लिए भला,

मैं भी लगाऊँगा दांव पर अपना दिल, तेरे दिल की खातिर,
परखूँगा मन की वफ़ाएँ भी, कहाँ तक साथ देता है शातिर,

जल जाती है उँगलियाँ यूँ ही नादानियों में, जलती लौ में ठंडक खोजने की ललक जो है,
बेसुध सा पड़ा होता हूँ कभी राहों में, संभलता भी हूँ, लड़खड़ा के, मंज़िल मेरी फ़लक जो है,

कल्पना तो है कि कल्पवृक्ष से छीन लूँ अनुराग,
ख़्वाहिश तो है कि मैं उर्वशी का बनूँ सुहाग,

|||

भुला दूँगा मैं सारी ख़्वाहिशें, त्याग दूँगा कल्पनाओं का परदेश,
यक़ीन कोई दिला दे मुझको, मैं हूँ अभी मुझमें कुछ शेष,

© Kumar Sonal


Advertisements

आरजू 

कुछ वज़ह तो भेजो, सावन की अल्हड़ घटाओं से,

रोज़ जाते हैं बरस के बेसबब, करके मुझको बदहाल,


मदहोश समीर भी लौट जाता है, बेवज़ह टकराते हुए,
तनिक हिदायत भी भेजो, जो ख़ुद को लूँ मैं संभाल,

ये दिल भी आग सा तप रहा अरसे से, इजाज़त जो मिले तेरे आँखों से,
तेरे नरम हथेलियों पे, रख दूँ मैं इन्हें निकाल …

© Kumar Sonal

एक दफ़ा …

असहज जब होने लग जाओ कभी ज़िन्दगी की छेड़खानी से —


अनसुना कर मन को, सुनकर दिल की आवाज़,
नजरअंदाज कर सारी सलाहें, भूलकर सारे रिवाज़,

अगर हो मुझपे जरा भी ऐतबार, आना मेरे पास एक बार,
कुछ अनकहें मशवरें हैं दिल की, जो करूँगा अखबार …

© Kumar Sonal

मेरा साथ …

जो गम है तेरा जानता तो हूँ पर मैं बता नही सकता, फिक्र भी तेरी करता हूँ पर मैं जता नही सकता …

भीगूंगा मैं भी तेरे साथ गम-ए-बारिश में, अगर मुश्किलों को मैं घटा नहीं सकता,
बनूँगा मैं एक नई याद, पुरानी यादें मैं तेरी अगर हटा नही सकता …


© Kumar Sonal

मुझे कहाँ कुछ हुआ है …

मुझे कहाँ कुछ हुआ है, 


बस नींद ही तो नहीं आती इन नम आँखों में ,
ग़म के कुछ दीमक ही तो लगे है मेरे ज़िन्दगी के शाखों में …

बस खुशियां ही तो देखती है मुझे तंज से,
पर सोहबतें तो अभी भी हैं रंज से …

बस ज़िन्दगी की नौका ही तो टूटी है, पूरी पतवार अब भी है हाथ में …
अपने ही तो दूर है मुझसे, उनका इकरार तो अब भी है साथ मे …

© Kumar Sonal 

मंजिल

ओ ! देख आसमान को, जो मंजिल है मेरी,

पहुंचूंगा वहाँ जरूर, बस मोम से कुछ रिश्तों को पिघलने भर की देरी है …

आतंक के रहनुमाओं को संदेश …

तेरे कायरता का क्या, तेरा भी नामोनिशान नहीं होगा, 

दफ़्न करने को तुझे राज़ी, न श्मशान होगा न कब्रिस्तान होगा …

लगा लेना हिसाब कभी ईमानदारी से, तेरे जनसँख्या से ज्यादा मेरा बलिदान होगा,
ठान लिया जिस दिन क़त्लेआम का, तेरे आँगन में हवन, तेरे छाती पर अज़ान होगा …

बिछा के रख जाल जमीं पे, खुद फँसोगे मैं नहीं, मेरा तो तेरे आसमाँ में उड़ान होगा,
कल्पना का संसार बनाने चले हो शायद, नादान हो तुम, तेरा मनसूबा भी नादान होगा …

ये जो मनमानियोँ की बारूद लिए फिर रहे हो अपने हाथों में, भांप लो, आ गया ज़िद पे जिसदिन, तेरा समाधान होगा,
उन्ही बारूदों के विस्फ़ोट में, जल रहा तेरा अरमान होगा, जल रहा तेरा पाकिस्तान होगा …

प्यासे हो लहू के, तो इस लहूलुहान की सुन लो, तेरे ही ज़द में, मेरा फ़रमान होगा,
बहुत श्वेत-कबूतर परोसे अबतक, अब तो जंग का ऐलान होगा …

निर्दोष मनुज को मार दे, तेरे ही लिए ये आसान होगा,
पर ठन गया जब ये युद्ध अगर, फिर न कोई एहसान होगा …

कतरा-कतरा रक्त निचोड़ लूँगा तेरे धमनियों से, लहू-विहीन तेरा ये पाक, रेगिस्तान होगा,
हर ओर एक बवंडर, डर का, हर ओर एक तूफ़ान होगा …

संदेह नही वैसे तो मुझे अपने वीरों पर, जिसके कंधे पर हिंद का कमान होगा,
फिर भी जो बच गए, तो समझ लेना, इंसानियत को हिन्द का अभयदान होगा …

आगाज़ से खुश हो जल्दी कर रहे तुम, डर तू कि, तेरा क्या अंजाम होगा,
खड़ा होजा तू कितनों निर्दोषों के शव पर, तेरे सिर से उच्चा मेरा ‘हिन्दुस्तान’ होगा …

पहचान कोई खास नहीं रखता ‘अंश’ –

एक हाथ में गीता तो एक में क़ुरान होगा,
मन रँगा हुआ तिरँगा से, दिल में हिंदुस्तान होगा,
ये ‘अंश’ है हिन्द का बोल रहा, हर ‘अंश’ यहाँ, हिन्द पे क़ुर्बान होगा …

© Kumar Sonal ‘अंश’

आबरू

वो तो आबरू है जुड़ी, आँचल से, जो संभाल लेती हूँ,

उतार फेंकूँगी इन्हें ‘अंश’ जिस दिन ज़माने की ज़िद जुड़ गई …

© Kumar Sonal ‘अंश’

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह …

शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह को नमन उनके जन्मदिवस पर —

समर्पित है मेरा एक छोटा सा प्रयास …
★ वो भगत सिंह थे … ★
आज़ादी के रवानी में, लहू उसने भी बहाई थी,

सबकी आज़ादी के खातिर, आज़ादी अपनी ठुकराई थी …
क्राँति की अलख जगाने को, त्यागी अपनी रिहाई थी,

ऊँचा कर मान तिरँगे का, सिर दुश्मनों की झुकाई थी …

वो भगत सिंह थे …
उम्र थी जब, गिल्ली-डंडे की, तब छेड़ी उसने लड़ाई थी,

एक मुट्ठी में बम-गोले, तो एक में ‘शरारत’ छुपाई थी …
बन्दूक थी मोटी कहीं उससे, जितनी मोटी कलाई थी,

पर देख कौशल उस युवा की, तानाशाही घबराई थी …

वो भगत सिंह थे …
भाग्य देखो उन बेड़ियों के, जो उनको छूने पाई थी,

फाँसी के नादां फंदे भी, तो देख उन्हें हर्षाई थी …
है वीर चला मुझे छोड़ सोच, काल-कोठरी भी अकुलाई थी,

हो विभोर ‘भगत’ की देशभक्ति से, दिन फाँसी की अलसाई थी …

वो भगत सिंह थे …
पीड़ा उनको लिखने वाली, वो क़लम भी कतराई थी,

शरमा रही थी जिस तक जाने से, खुद ही जिसकी कठिनाई थी …
मार देने, या मर जाने की, बस धुन जिसमे समाई थी,

हुँकार सम्पूर्ण भारतवर्ष का, बहरों को जिसने सुनाई थी …

वो भगत सिंह थे …
व्याकुल है मन, यही सोच-सोच –
पुण्य क्या उस कुँए का, पानी जिसने पिलाई होगी,

भाग्य क्या उस कतरन का, लहू-आँसू से जिसे भिगाई होगी,

मुक़द्दर क्या उस फंदे की, जिसको गले उसने लगाई होगी,
थी आज़ादी जिसकी दुल्हन, उसको भी सौंप, वे चले गए,

ज़वानी अपनी, अपना मन, अपनी प्राण झोंक वे चले गए …
#नमन #शहीद_ए_आज़म #भगत_सिंह

                🙏🙏🙏
© Kumar Sonal

लिखने की ज़िद …

हिचकियाँ जब यादों के भारी पड़ते हैं, मेरे आज पर, तो लिख लेता हूँ बस, कभी कभी, अपनी परेशानियाँ …

अफवाहों के सफाई में कौन उलझे, जब दिल में अंबार पड़े हो हसरतों की, तो सह लेता हूँ, कभी कभी, अपनी झूठी बदनामियाँ …

जब शिथिल सी होने लग जाती है ये ज़िन्दगी, तो रफ़्तार को, कर लेता हूँ मैं भी, कभी कभी, हल्की सी, मीठी सी बचकानियाँ …

आईने में देख खुद को, तस्वीर किसी और की उभरती है, तो मुस्कुरा भी देता हूँ, कभी कभी, याद कर बीती नादानियाँ …

समझ जो जाता है कोई, इन मुस्कराहटों के पीछे का सच, तो छिपा लेता हूँ सारी सच्चाई, छेड़ कर नई कहानियाँ …

व्यथा दौड़ने लग जाती है, अगले ही पल, धमनियों में, रोकूँ कैसे आखिर, जो उभर आती है चेहरे पर ये अनचाही हैरानियाँ …

मैं ख़ुद छूट जाता हूँ पीछे मेरे परछाई के, सारे मालूमात, सारे इल्मों से परे, दिख ही जाती है, इस बेईमान दिल की बेइमानियाँ …

© Kumar Sonal