मैं साहिल था …

*मैं साहिल था …*


मैं साहिल सा था, हर डूबते की ख़्वाहिश थी मुझ तक आने की,
किसी लहर सा छूते-छूते, तूने मुझे कमजोर कर दिया,

भले बिखरा था मैं रेत सा,
पड़ा भी रहता था अचेत सा,

मैं तपता था खुद की दहक से, पर मुझ में भरा शीतलता भी था,
मैं निर्बल, निर्जीव सा था, पर मुझ में एक कोमलता भी था,

अपनी हसरत भरी मुट्ठी में बांध मुझे कठोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,


खामोशियाँ ही मेरी राज़ थी अबतक,
मुस्कुराहटें ही मेरी आवाज थी अबतक,


तेरी बेदर्द उसूलों ने,
मेरे अनजानी भूलों ने,

इस सन्नाटे भरे, सुनसान दिल में, एक शोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,

भले जाल भी बिछाया था सपनों ने, पर वहाँ सत्य बिकता तो नहीं था,
वार दुश्मन ने है किया या अपनों ने, कम से कम दिखता तो नहीं था,

मैं उन अँधेरों में ही ठीक था,
दूर इन सबेरों से ही ठीक था,

खो गया सबकुछ अब चकाचौंध में, जो तूने इस जहाँ को अँजोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,

जैसा भी हो वो कायनात था मेरा,
उलझा ही सही पर हयात था मेरा,

बेपरवाह, बंजारा था मैं, या कहलो रूढ़िवादी ही था,
खानाबदोश, आवारा भी था, पर नसीब आजादी भी था,

बंधन रश्म-ए-रीत से तूने मुझे सराबोर कर दिया,
मैं साहिल था …. किसी लहर सा तूने कमजोर कर दिया,


© Kumar Sonal

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