लिखने की ज़िद …

हिचकियाँ जब यादों के भारी पड़ते हैं, मेरे आज पर, तो लिख लेता हूँ बस, कभी कभी, अपनी परेशानियाँ …

अफवाहों के सफाई में कौन उलझे, जब दिल में अंबार पड़े हो हसरतों की, तो सह लेता हूँ, कभी कभी, अपनी झूठी बदनामियाँ …

जब शिथिल सी होने लग जाती है ये ज़िन्दगी, तो रफ़्तार को, कर लेता हूँ मैं भी, कभी कभी, हल्की सी, मीठी सी बचकानियाँ …

आईने में देख खुद को, तस्वीर किसी और की उभरती है, तो मुस्कुरा भी देता हूँ, कभी कभी, याद कर बीती नादानियाँ …

समझ जो जाता है कोई, इन मुस्कराहटों के पीछे का सच, तो छिपा लेता हूँ सारी सच्चाई, छेड़ कर नई कहानियाँ …

व्यथा दौड़ने लग जाती है, अगले ही पल, धमनियों में, रोकूँ कैसे आखिर, जो उभर आती है चेहरे पर ये अनचाही हैरानियाँ …

मैं ख़ुद छूट जाता हूँ पीछे मेरे परछाई के, सारे मालूमात, सारे इल्मों से परे, दिख ही जाती है, इस बेईमान दिल की बेइमानियाँ …

© Kumar Sonal

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